सुनो, सुनो एक बात सुनो
Note:- This post has been requested, demanded and so written specially for Hindi readers and is almost a translation of my post “Red Coloured Blues” with some more intricate details thrown into it.
English readers- You can skip the post.
Bilingual readers- I’ve worked very hard on this.. .. Please do read; forward the link to your people and let me know if I can still blog in Hindi. ![]()
Hindi readers- Blame it on my education; I am more comfortable in reading/writing in English language so please forgive me for any mistakes or errors, they are unintentional.
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जब मैंने अपनी आपबीती अंग्रेजी भाषा के इस चिट्ठे में सुनाई और भारतीय महिलाओं के ऊपर लादे हुए रीति रिवाजों और कुरीतियों के बारे में लिखा तो काफी शोर शराबा हुआ | कुछ लोगों को पसंद नहीं आया कि मैं एक अत्यंत निजी बात को कैसे बेशर्मी से सबके सामने पेश कर सकती हूँ और दूसरी तरफ ज्यादातर पुरुष इस बात से अवगत ही नहीं थे कि ऐसा भी होता है | ज़ाहिर है वे बहुत नाराज़ और दुखी हुए और तकरीबन सबने कहा कि वे इसका विरोध करेंगे |
तो ज़रा आप भी सुनिए और गौर कीजिये .. क्या-क्या होता है हमारे भारत में और यह सब कहाँ तक उचित है |
यहाँ मैं एक ऐसी घटना के बारे में बताने जा रही हूँ जो आज की इक्कसवीं सदी में भी कई भारतीय घरों में रिवाजों के नाम पर होती आ रही है | यह अन्य धर्मों में भी होता है लेकिन हिन्दू धर्म में कुछ ज्यादा ही | लेकिन मेरा आशय हिन्दू धर्म या किसी और धर्म को नीचा दिखाना कतई नहीं है |
मेरे कॉलेज के दिन थे | मेरी एक सहेली के घर में शादी थी और वह उसमें शामिल होने के लिए चेन्नई के लिए रवाना हो चुकी थी | मुझे भी उसी शहर में दो दिन बाद एक सेमीनार में उपस्थित होना था | सो मुझे उस सहेली के घर में ठहरने और शादी में शामिल होने का निमंत्रण मिल गया जो मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया |
जाने के पहले का सप्ताह बहुत व्यस्त था, मुझे अपनी तैयारी के साथ-साथ शादी के लिए भी कुछ सामान खरीदना था जो उन लोगों ने मुझसे मंगवाया था | खैर, जैसे तैसे मैं भी चेन्नई पहुँच ही गयी | उनका दो मंजिला घर बहुत बड़ा था | पीछे का आँगन आम, केले और नारियल के पेड़ों से घिरा था और एक बड़ा सा कुआँ भी था | आगे का लॉन भी कम छोटा नहीं था | वहां खड़ी दो गाड़ियां घर की शोभा और बढा रही थीं |
वहां पहुँचने के बाद मुझे ऐसे लगा जैसे मैं भी उस घर की ही एक सदस्या हूँ | माहौल ही कुछ ऐसा था | शादी की खरीदारी, कपड़े, गहने, मेहँदी इत्यादि ने हमें पूरे दिन व्यस्त रखा | मुझे लगा वहां ठहरने का मेरा निर्णय सही था |
फ़िर देर शाम को लगभग आठ बजे अचानक मुझे आभास हुआ कि मेरा रजोधर्म आरम्भ हो गया है | अरे ! यह क्या ? अभी तो इसका टाइम भी नहीं आया | एक हफ्ता पहले कैसे हो गया ? लेकिन ऐसा कई बार हो जाता है | रजोधर्म कभी-कभी बिना बताये ही दो तीन दिन आगे पीछे चला आता है हमें परेशान करने | एक स्वस्थ महिला में इसका कारण मानसिक परेशानी या शारीरिक थकान या फ़िर दोनों हो सकते हैं |
खैर, मेरे पास तो कोई इन्तेजाम था नहीं सो मैंने अपनी सहेली से पूछा कि क्या उसके पास कोई पैड वगरेह है | उसने मुझे दिया पर उसने एक और काम भी किया | मेरी सहेली ने अपनी माँ को मेरी स्थिति के बारे में अवगत कराया जो मैं समझती हूँ उचित था |
बस फ़िर क्या था मुझे लगा कि जैसे मेरे ऊपर वज्रघात हो गया हो. बिजली गिर पड़ी हो | दो मिनट के अन्दर सभी परिवार जनों व मेहमानों को चेतावनी दे दी गयी जैसे मुझे कोई छूत की बीमारी लग गई हो |
सबसे पहले मुझसे पूछा गया कि मैंने इसे रोकने के लिए कोई दवाई क्यों नहीं ली |
दवाई ? क्या कोई ऐसी दवाई भी होती है ? फ़िर मुझे मेरी सहेली ने बताया कि सभी महिलाएँ जो इस बात को मानती हैं, और अगर उनके मासिक धर्म का समय नजदीक हो तो कोई भी त्यौहार या शादी ब्याह से पहले मासिक धर्म को रोकने के लिए वे एक दवाई का सेवन करती हैं |
लेकिन इस तरह की हार्मोन की गोलियाँ लेना तो अपने शरीर के साथ खिलवाड़ करना हुआ | एक-दो बार नहीं, पूरी ज़िन्दगी जब कभी भी मासिक धर्म किसी त्यौहार के बीच में टांग अड़ाए बस दवाई खा लो | क्या इन महिलाओं को मालूम नहीं कि ऐसा करने से शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है और कई परेशानियाँ उठ खड़ी होती हैं ? यहाँ तक कि मासिक धर्म अनियमित हो जाते हैं और गर्भ धारण करने में भी समस्या आ सकती है ? मैंने अपने आप को खुशकिस्मत समझा कि मेरा जन्म ऐसे रुढ़िवादी परिवार में नहीं हुआ जो ऐसे रिवाजों की हिमायत करता हो |
मुझे कड़ी हिदायत दी गयी कि मैं किसी भी वस्तु या व्यक्ति को स्पर्श न करूँ और आनन् फानन में मुझे एक छोटे से कमरे में हकेल दिया गया | कमरा 6X6 से बड़ा नहीं था, खिड़की नदारद और सामान के नाम पर एक कोने में बस एक लोहे की कुर्सी थी | कमरे के साथ ही जुडा था एक बहुत ही छोटा सा शौचालय |
पानी पीने के लिए पानी से भरी एक प्लास्टिक की बोतल रख दी गयी जिसको बाद में फेंक दिया जाना था और खाने के लिए एक पुरानी स्टील की प्लेट जो खासकर इस समय के लिए ही रखी गयी थी | उस घर में जिस भी महिला को रजोधर्म होता, वह इसी प्लेट में खाना खाती | मुझे दूसरे लोगों के साथ बैठने, खाना खाने या किसी भी प्रकार के मिलने जुलने में पाबन्दी थी | मुझे लगा मैं तीन दिनों के लिए उस कमरे में कैद कर दी गयी थी | जो भी मेरे लिए खाना लाता, एक फ़ुट की दूरी से मेरी थाली में इस प्रकार फेंकता जैसे मेरे छूत की बीमारी का करंट उसे न लग जाये |
क्या कभी आपने किसी कुत्ते को खाना देते हुए देखा है ? वह दृश्य उससे भी बदतर था | पालतू जानवर के सर पर भी कभी कभार हाथ फेर दिया जाता है |
मेरी आँखों में आँसू आ गए | ये कैसा व्यवहार किया जा रहा है मेरे साथ | मेरा कसूर क्या है ? एक लड़की के रूप में जन्म लेना ? हम अपनी लड़कियों को सिखाते हैं दूसरे घर के नियमों का पालन करना, नए परिवार, नए घर के साथ घुल मिल जाना और बड़ों के कहे का आदर करना लेकिन यह तो कुछ और ही था |
यह प्रथा दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित है | जिस घर में इसका पालन नहीं होता, लोग उँगलियाँ उठाते हैं | ऐसा मुझे कहा गया | लेकिन इस तरह का बर्ताव हमारी अज्ञानता को दर्शाता है और यौन शिक्षा का अभाव के कारण होता है |
और हाँ ! एक बात तो मैं भूल ही गयी | जिस बिस्तर पर हम बैठे थे, मुझसे वहाँ की चादरें हटवायीं गयीं | वे सभी चीज़ें मेरे छू जाने से अपवित्र हो गयी थीं | उन सभी लोगों ने जिन्होंने मुझे अनजाने में छुआ था या तब तक मेरे साथ बैठे थे, अपना ‘शुद्धिकरण’ स्नान करके किया |
खैर, शादी हुई, और जैसा मैंने सोचा था मुझे उसमें शामिल होने की अनुमति तो मिली मगर दूर एक कोने में बैठकर | मैं अपनी इतनी बेईज्ज़त्ती बर्दाश्त नहीं कर सकती थी सो मैंने घर पर ही रहना उचित समझा |
मुझे एक चटाई पर सोना पड़ा | रसोईघर और पूजा कक्ष में घुसना तो दूर, उनकी तरफ मुँह करने की भी अनुमति नहीं थी | हालांकि पुस्तक पढ़ने और प्लास्टिक की वस्तुएं छूने की इजाज़त थी, लेकिन कपड़े या धातु को छूना वर्जित था | मैं यह समझती हूँ कि चूंकि पुस्तक और प्लास्टिक का आविष्कार सदियों पुराने रिवाजों के बनने के बाद हुआ इसलिए हमारे पूर्वजों के पास इसका कोई विकल्प नहीं था |
तीन दिन पूरे होने पर स्नान के समय मुझे अपने बालों को धोना था और अपने शरीर को अच्छी तरह से मलना था जैसे किसी गन्दगी को हटाना हो | अगर आपको १०२ डिग्री बुखार भी हो तो भी आप इससे बच नहीं सकते | जान जाये पर रीति रिवाज़ न जाये | हाँ, मुझे वह सब कपड़े (जिनमे चादरें भी शामिल थीं ) धोने पड़े जो मैंने इन तीन दिनों में पहने थे या छुआ था |
मैं एक ऐसे घर से आई थी जहाँ ब्राह्मिण होने के बावजूद सभी जाति के लोग समान रूप से एक साथ बैठकर खाते थे, जहाँ लड़के और लड़की में कोई भेद न था और लड़की के रजस्वला होने को एक स्वस्थ और आम बात माना जाता था | मेरे साथ इस घर में ऐसा व्यवहार मेरे लिए एक बेहद शर्मनाक हादसा था |
मैं अत्यधिक क्रोधित, रोषित और डरी हुई थी | मेरे परिवार में महिलाओं को कभी भी रजोधर्म के समय अलग नहीं किया गया था। क्या रजस्वला होना कोई पाप है ? क्या मेरे रजोधर्म से मेरे समाज में कोई हानि होती है या फिर कोई अपशगुन ? जब महात्मा गांधी ने अछूतों पर हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, क्यों नहीं उन्होंने इसके खिलाफ भी नारे लगाये ? मेरे मन में इसी प्रकार के कई सवाल उठ रहे थे | सती प्रथा, बाल विवाह और देवदासी .. .. जो मुझे अब तक बीती सदी की बातें लगतीं थीं, इस इक्कसवीं सदी में सामने प्रकट हो आयीं |
यह वही घर था जहाँ मेरी सहेली के रजस्वला होने पर खुशियाँ मनाई गयीं थीं, पड़ोस की औरतों को बुलाया गया था और उसे बधाई के साथ साथ कई कीमती तोहफे भी भेंट किये गए थे | जब यह ख़ुशी मनाने वाली बात थी तो फ़िर कैसे किसी को पूरी ज़िन्दगी महीने दर महीने सज़ा दी जा सकती है ? और वह भी एक ऐसी बात पर जिसका होना एक प्राकृतिक क्रिया है ?
भारत में तकरीबन ५०% महिलाएं हैं और उनमें से एक अच्छा हिस्सा रजस्वला | फ़िर भी रजोधर्म की बातें घर के अन्दर, महिलाओं के बीच ही दबकर रह जाती हैं | लड़कियाँ आवाज़ उठा नहीं सकतीं और पुरुषों को या तो ज्यादा जानकारी नहीं है या फ़िर उन्हें इन बातों में दखल न देने को कहा जाता है | परिणाम यह है कि सदियों पुरानी परंपरा को हम आँख मूंदकर झेलते आ रहे हैं | हो सकता है स्त्रियों को आराम देने के लिए उस ज़माने में कुछ नियम बनाये गए हों लेकिन आजकल जहाँ स्त्रियों को कंधे से कन्धा मिलाकर चलना पड़ता है, यह बेमानी हो चला है |
सवाल यह है कि हम महिला और पुरुष क्यों नहीं इस सदियों पुरानी प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं ? क्यों हम समझते हैं कि जो भी हमारे पूर्वज करते आ रहे हैं वह हमेशा ही सही एवं उचित होता है ? क्यों पुरुष अपनी पत्नी या बहन पर होनेवाले अत्याचार के खिलाफ बोलने में हिचकिचाते हैं ?
महीने दर महीने हम महिलाएँ पेट दर्द, कमजोरी और अन्य परेशानियों से घिरे इस दौर से गुजरती हैं | हाँ, कभी कभार झुंझलाहट भी होती है और थोड़े आराम की ज़रूरत भी | लेकिन आराम कैसे, कहाँ और कितना किया जाए इसका हक़ हमें ही होना चाहिए न कि समाज के ठेकेदारों को |
हमें अच्छा लगेगा यदि पुरुष बजाय चुपचाप दूर से तमाशा देखने के रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हमारी मदद करें, चाहे यह कदम कितना ही छोटा क्यों न हो |
कितनी भी बाधाएं आएँ, मुझे अपने महिला होने पर गर्व है और हमेशा रहेगा |
Current Song:- बड़ी सूनी सूनी है - किशोर कुमार
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उन्मुक्त said,
March 1, 2009 @ 4:21 am
लगता तो है कि आपने बहुत मेहनत की है
मेरा तो अभी भी कहना है कि आप हिन्दी में अलग से एक चिट्ठा लिखना शुरु करें।
यह सच है कि रजोधर्म के बारे में लोगों को ठीक जानकारी नहीं रहती और यह यौन शिक्षा के आभाव के कारण है।
अंकुर गुप्ता said,
March 1, 2009 @ 10:46 am
ये हुई ना बात. बहुत बढिया अनुवाद. मैने कई लोगों को लिंक भेजा है. वैसे अगर आप हिंदी में ज्यादा लिखने लगेंगी तो हिंदी में दिक्कत खत्म हो जायेगी.
उन्मुक्त जी, यौन शिक्षा के बारे में एक चिट्ठे के बारे में क्या ख्याल है. मैं तो नही लिख सकता हूं पर अगर कोई लिख सके तो बहुत अच्छा रहेगा.
ashes said,
March 1, 2009 @ 11:46 am
बहुत ही उम्दा अनुवाद। आप अच्छा तो लिखतीं हैं हिंदी में भी…मैं उन्मुक्त जी से सहमत हूँ कि आपको हिंदी में अलग चिट्ठा शुरू करना चाहिए।
अंकुर:
उन्मुक्त जी ने यौन शिक्षा पर कुछ चिट्ठे लिखे तो हैं।
अंकुर गुप्ता said,
March 1, 2009 @ 12:24 pm
उन्मुक्त जी ने यौन शिक्षा पर कुछ चिट्ठे लिखे तो हैं।
ashes, मुझे जानकारी नही थी. अब देखता हूं.
उन्मुक्त said,
March 1, 2009 @ 1:05 pm
अंकुर जी, मैं यौन शिक्षा का पक्षधर हूं। मैं ब्लॉगर और वर्डप्रेस दोनो पर चिट्ठे लिखता हूं और दोनो पर कुछ चिट्ठियां यौन शिक्षा पर लिखीं हैं। मेरे उन्मुक्त चिट्ठे और छुटपुट चिट्ठे पर यौन शिक्षा की श्रेणी पर चिट्ठियों को यहां और यहां देखने पर, इन चिट्ठियों को पढ़ा जा सकता है।
Cuckoo said,
March 1, 2009 @ 1:05 pm
आप सब,
अरे अरे, इतना ज़ुल्म मत ढाइए | पहले ही तीन बच्चे अररररर.. मेरा मतलब तीन चिट्ठे हैं जिन्हें संभाल पाना मुश्किल है और अब चौथा भी ?
आप सबको मेरा हौसला अफजाई करने के लिए धन्यवाद, मेरा मनोबल आसमान तक जा पहुंचा है | मेरी कोशिश रहेगी कि यहीं पर मैं हिंदी में कुछ अधिक लिखूं | अच्छा, इतना तो कर ही सकती हूँ कि कम से कम एक चिट्ठा हर महीने लिखा जा सके | शुरुआत के लिए शायद यह काफी होगा |
और हाँ, यौन शिक्षा पर उन्मुक्त जी ने बहुत कुछ लिखा है | मैं भी एक महिला के नज़रिए से लिखने की कोशिश करुँगी |
क्यों, ठीक है ना ?
kunjal said,
March 1, 2009 @ 4:44 pm
Hi Cuckoo!!! I feel that you have described it more vividly in Hindi as compared to your English post !! Good effort
kunjal said,
March 1, 2009 @ 4:45 pm
and yes sorry I am still not familiar with post in hindi font so I am using enlish here!!!soon I will try too
Cuckoo said,
March 1, 2009 @ 5:09 pm
कुंजल,
धन्यवाद | भई, कुछ तो भिन्नता दिखनी चाहिए थी न दोनों पोस्ट में ! बिलकुल शब्द् ब शब्द् मैच नहीं करना था मुझे |
Sugar'n'Spice said,
March 2, 2009 @ 12:03 am
क्या बात है कुक्कू, हिन्दी में जम के लिखा है!
Jeevan said,
March 2, 2009 @ 7:45 pm
Achha hindi padhneka exercise tha.. sahi hai!
Poonam said,
March 3, 2009 @ 5:01 pm
कई तरह से औरत की इस मासिक क्रिया को शर्मनाक घटना की नज़र से देखा जाता है,जब की वास्तव में यह माँ बनने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है और एक स्वस्थ शरीर का द्योतक भी. इस विषय पर और हिन्दी में लिखने के लिए बधाई .
Manish said,
March 4, 2009 @ 1:02 pm
आपने एक ऍसी कुरीति की बात की है जो कुछ हद तक खात्मे की ओर है। उत्तर भारत में ब्राहम्ण परिवारों में इस तरह की बातें सुनी हैं पर ये प्रवृतियाँ कम होती जा रही हैं। आपने अच्छा किया कि इस समस्या को अपने अनुभवों से जोड़ कर यहाँ विस्तार से चर्चा की। ऍसे विषयों पर जितनी खुली चर्चा हो उतना ही अच्छा क्यूँकि पुरुष हो या स्त्री जिस किसी के परिवार में ऐसा हो रहा है इसे दूर करने में अपना योगदान करे।
और हाँ travel blog के आलावा हिंदी में लिखने की बधाई।
PN Subramanian said,
March 5, 2009 @ 7:01 pm
कुहू जी,
बहुत ही सुन्दर लिखा है. हमें लगता ही नहीं कि यह वही कक्कू है जो प्राण खाऊ अंग्रेजी में लिखती है | आभार..
Cuckoo said,
March 7, 2009 @ 4:25 pm
आप सब,
आप सब का धन्यवाद् |
पूनम जी,
आपका स्वागत है यहाँ इस चिट्ठे पर |
आशा है आप आती रहेंगी |
मनीष जी,
यह कुरीति उत्तर भारत में चाहे कम हो या सुनने में न आई हो पर दक्षिण भारत में अभी भी बहुत प्रचलित है
आने के लिए धन्यवाद्, आते रहिये |
सुब्रमनियन जी,
भाषाएँ तो सभी अच्छी होती हैं, जितना सीखें उतना कम |
आने के लिए धन्यवाद्, आते रहिये, टिप्पणी करते रहिये |
Vands said,
March 25, 2009 @ 12:47 am
mujhse hindi mein comment nahi hoga… but ya awesome post, i had no idea abt any such tablets or the fact that the advent of menstruation is a cause for celebration as well!!
strange and ridiculous both
VIKRAM said,
November 29, 2009 @ 12:31 pm
hey it was nice post . even i have noticed it many times and i feel very bad about it , and i feel sorry for those who are suffering in such a society.why people don’t understant that it is a natural thing to happen and using medication is going against nature.
take care
PN Subramanian said,
December 3, 2009 @ 9:53 pm
बहुत सुन्दर. संभवतः हमने आपके अंग्रेजी चिट्ठे में भी कुछ कहा था. कुछ दक्षिण भारतीय ब्राह्मण परिवारों में यही परंपरा है. बड़ी सुखद बात यह है की आपके कमरे के साथ लगा हुआ टोइलेट भी था. आजकल हम लोग काफी लिबरल हो गए हैं. It was accidental that यू landed up at अ home where people still continued with their old त्रदितिओन्स. आपको शायद इस बात का भ्रम है की आपकी अंग्रेजी हिंदी से अधिक अच्छी है. भूल जाईये. आपकी हिंदी अत्यधिक प्रभावी है. .